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आदमी आदमी को लूटता है


आदमी आदमी को ही लूटता है
अपना पराया सभी को लूटता है

क्‍या खोया क्‍या पाया सोचता है
दुख भीतर ही तो कचोटता है

जीवन में खो जाते है जो जो
उन्‍ही को बार बार खोजता है

हार जीत का प्रश्‍न है गौण अब
जीवन जीवन को ही घसीटता है

दे दे विराम कह दे अलविदा
यही विचार अब जहर घोलता है

अजब है तुम्हारी ये बड़ी बड़ी बातें
विक्षिप्त कभी  झूठ नहीं बोलता है

3 COMMENTS:

kuldeep thakur on 7 अप्रैल 2016 को 9:27 am ने कहा… Best Blogger Tips[Reply to comment]Best Blogger Templates

आपने लिखा...
कुछ लोगों ने ही पढ़ा...
हम चाहते हैं कि इसे सभी पढ़ें...
इस लिये आप की ये खूबसूरत रचना दिनांक 08/04/2016 को पांच लिंकों का आनंद के
अंक 266 पर लिंक की गयी है.... आप भी आयेगा.... प्रस्तुति पर टिप्पणियों का इंतजार रहेगा।

रश्मि शर्मा on 8 अप्रैल 2016 को 5:53 pm ने कहा… Best Blogger Tips[Reply to comment]Best Blogger Templates

हां..आज का सच ही लि‍खा आपने। साधुवाद

yashoda Agrawal on 17 अप्रैल 2016 को 7:48 am ने कहा… Best Blogger Tips[Reply to comment]Best Blogger Templates

विक्षिप्त कभी भी झूठ नही कहता
रेखांकित करती हूँ.....आपके इस आधार शिला को
सादर

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