! !

कुते भौंक रहे है



गोरे गए अब काले लूट रहे है 
तिजोरियों के तालें टूट रहे है 

मुफलिसी का आलम है चहुं ओर 
हुक्‍मरानों के पटाखे फूट रहे है

आवाज उठाना तेरे मेरे बस में नहीं
सांस अन्‍दर ही अन्‍दर टूट रही है 

ख्‍वाब की बदल डालोगे जहां
ये कैसी इक हूक उठ रही है

मुन्सिब क्‍या पकड़ेगा जुर्म को
जनाब के पसीने छूट रहे है 

बस्‍ती में  घुस आए है गीदड़
सुनो ज़रा गोर से कुते भौंक रहे है 


रौशन जसवाल विक्षिप्‍त

4 COMMENTS:

kuldeep thakur on 6 अक्तूबर 2015 को 10:42 am ने कहा… Best Blogger Tips[Reply to comment]Best Blogger Templates


आप की लिखी ये रचना....
07/10/2015 को लिंक की जाएगी...
http://www.halchalwith5links.blogspot.com पर....
आप भी इस हलचल में सादर आमंत्रित हैं...


Kavita Rawat on 6 अक्तूबर 2015 को 4:55 pm ने कहा… Best Blogger Tips[Reply to comment]Best Blogger Templates

सटीक सामयिक...
हर तरह उनका राज
कौन सुनेगा आवाज ....

रौशन जसवाल विक्षिप्‍त on 6 अक्तूबर 2015 को 6:13 pm ने कहा… Best Blogger Tips[Reply to comment]Best Blogger Templates

@kuldeep thakurआभार्

रौशन जसवाल विक्षिप्‍त on 6 अक्तूबर 2015 को 7:52 pm ने कहा… Best Blogger Tips[Reply to comment]Best Blogger Templates

@Kavita Rawatआभार्

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