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गंभरी देवी की आवाज सदा के लिए खामोश हो गई



gambhari
 हिमाचल कोकिला  गंभरी देवी की मनमोहक आवाज सदा के लिए खामोश हो गई खाणा पीणा नंद लैणी ओ गंभरिए, खट्टे नी खाणे मीठे नी खाणे, खाणे बागे रे केले ओ...।
जिंदगी को इसी खुशनुमा अंदाज में जीते हुए  गंभरी देवी की आज आवाज सदा के लिए खामोश हो गई। संस्कृति एवं कला के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य के लिए टेगोर अवार्ड से सम्‍मानित बिलासपुर की गंभरी देवी का निधन हो गया है। उनकी मृत्यु का संस्कृति
एवं लोक कला के क्षेत्र से जुडे़ लोगों के लिए यह बड़ी क्षति मानी जा रहा है। आज प्रात:  गंभरी ने अपने पैतृक गांव डमेहर में अंतिम सांस ली। आज ही उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया। उनके बडे़ बेटे मेहर सिंह ने उन्हें आग लगाई।  गंभरी देवी हिमाचल ही नहीं बल्कि उत्तर भारत में अपनी कला का लोहा मनवा चुकी है। अपने मशहूर गीतों को जहां उन्होंने सुरीली आवाज दी वहीं उनके नृत्य का अंदाज भी कम नहीं था। बिलासपुर जिले की बंदला धार पर स्थित गांव बंदला में करीब 90 वर्ष पूर्व गरदितु और संती देवी के घर जन्मी गंभरी किशोरावस्था से ही कला के बुलंदियों पर पहुंची। अनपढ़ होते हुए भी अपने गीत खुद बनाए। आवाज दी और नृत्य कर उसे और आकर्षक बनाया। गंभरी देवी को अखिल भरतीय साहित्य एवं कला अकादमी दिल्ली की ओर से सम्मानित किया जा चुका है। स्वास्थ्य ठीक न होने की वजह से वह वहां नहीं जा पाई थी लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल ने इसी वर्ष 15 अगस्त को कुल्लू में आयोजित राज्य स्तरीय कार्यक्रम में उन्हें यह सम्मान दिया। उन्हें टेगोर अवार्ड से भी नवाजा गया। गंभरी देवी ने जालंधर दूरदर्शन में भी अनेक कार्यक्रम दिए। वहां सैनिकों के लिए भी उन्होंने कई कार्यक्रम पेश किए

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