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शनिवार, दिसंबर 1

पारंपरिक लोकोत्सव बूढ़ी दिवाली




बूढ़ी दिवाली ग्रामीण लोक जीवन की अभिव्यक्ति का माध्यम है। बूढ़ी दिवाली लोक संस्कृति में सामूहिक हर्षोल्लास का पर्व है, जो सामाजिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक विशिष्ठता रखता है। यह लोकोत्सव सृजनात्मकता एवं सांस्कृतिक एकता  का प्रतीक है संस्कृति के तीज त्योहारों में कार्तिक माह की अमावस्या को पड़ने वाले उमंग और उत्साह से भरपूर दीपावली का त्योहार बुराई पर अच्छाई तथा अंधकार पर प्रकाश का प्रतीक है, लेकिन हिमाचल प्रदेश के कुछ पर्वतीय भागों में दिवाली के ठीक  एक माह बाद मार्ग शीर्ष मास की अमावस्या की बूढ़ी दिवाली का लोकोत्सव मनाया जाता है। हर प्रांत तथा क्षेत्र में बूढ़ी दिवाली मनाने के कारण एवं तरीके विभिन्न हैं, जहां नई दिवाली भगवान राम की लंका विजय के बाद अयोध्या आगमन के हर्षोल्लास का पर्व है, वहीं बूढ़ी दिवाली का संबंध बाहुबली दानवीर राजा बलि के पाताल लोेक के निर्गमन का सूचक है। इसे बलराज उत्सव भी कहा जाता है। सिरमौर जनपद में बूढ़ी दिवाली की शुरुआत बलग गांव से होती है, जिसे  राजा बलि की स्थली माना जाता है।  सिरमौर के गिरिपार हाटी इलाके के लादी कांगड़ा क्षेत्र (शिलाई) के नौणीधार, द्राबिल, टटियाणा, हलांक, नाया-पंजोल तथा रेणुकाजी क्षेत्र के रजाणा, पुन्नरधार, भराड़ी तथा चाढ़ना आदि स्थानों में बुढ़ाह लोकनृत्य के साथ बूढ़ी दिवाली का शुभारंभ होता है। रात को लोग देव आंगन में पवित्र अग्नि प्रज्वलित करते है, जिसे ‘घियाना’ कहा जाता है। ‘घियाना’  के चतुर्दिक गांववासी अग्नि पूजा करते है। उपस्थित पुरुष सदस्य ‘घियाना’  से मशाले जलाते हैं, जिन्हें ‘डाह’ या ‘हुशु’ कहा जाता है। आराध्य ग्राम देवों के सम्मान में जलती मशालों के साथ होलाच नृत्य किया जाता है और फिर रासा-नाटी नृत्य में महिलाएं और पुरुष एक-दूसरे को अश्लील व्यंग्यात्मक गीतों से रिझाते हैं। अगली सुबह गत रात्रि के भोंडे गीतों के अपराध बोध का पश्चाताप करने के लिए परस्पर अखरोट बांट कर अभिवादन किया जाता है। दो-तीन दिन चलने वाले इस प्रकाशोत्सव में ग्रामीण लार टपकाऊ पहाड़ी व्यंजनों-खीर, पटांडे, तेल पक्की, कांजण-बिलोई व द्रोटी-भात आदि का आनंद उठाते हैं तथा खूब नाच-गान होता है। बूढ़ी दिवाली को यहां ‘मशराली’ के नाम से भी जाना जाता है। संध्याकाल में लोक नाट्यों में रामायण व महाभारत के दृश्यों का मंचन किया जाता है। हिमाचल की लोक संस्कृति व्यापक है। सिरमौर जिला के अलावा शिमला, कुल्लू तथा किन्नौर जिलों में भी बूढ़ी
दिवाली का त्योहार मनाया जाता है। जिला शिमला के रावी गांव में बूढ़ी दिवाली के दिन राजा बलि की आटे की मूर्ति बनाई जाती है और उसकी छाती पर दीये जलाकर स्थानीय देवता बोंडा नाग की पूजा की जाती है तथा महिलाएं ब्रह्म भेंट गीत गाती हैं। नीरथ गांव में मार्ग शीर्ष अमावस्या की दिवाली की रात प्रसिद्ध पारंपरिक मेला लगता है। कुल्लू जनपद के निरमंड गांव की बूढ़ी दिवाली काफी प्रसिद्ध है। यहां के ‘फकीरी’ ब्रह्मण अमावस्या की इस रात महादानी राजा बलि की कथा का भारथ (इतिहास) गाते हैं। ऊपरी कुल्लू घाटी मेें बूढ़ी दिवाली की रात लोग अपने घरों एवं देवालयों में पवित्र अग्नि से बलराज जलाते है, इसे शौली कहा जाता है। गांव के युवा अश्लील गीत ‘जीरू’ का जोर-जोर से गायन पुकार करते हैं, जिसका इस रात कोई बुरा महसूस नहीं करता। किन्नौर जिला के निचार तथा सांगला क्षेत्रों में बूढ़ी दिवाली को ‘दीवाअल’ के नाम से हर्षातिरेक से मनाया जाता है, जहां क्रमशः उषा देवी और देरिंग नाग देवता के सम्मान में गीत गाए जाते हैं। स्वादिष्ट व्यंजनों के साथ ग्रामीण फसलों की कटाई का जश्न मनाते हैं। सिरमौर जनपद की गिरिपार हाटी संस्कृति की समरूपता के लिए पड़ोसी उत्तराखंड राज्य के बावर जौनसार तथा देऊधार क्षेत्र के झोटाड़, मंडोल, चिलाड़ व रडू आदि कई गांव में मार्ग शीर्ष अमावस्या की रात्रि को बूढ़ी दिवाली का दीपोत्सव पारंपरिक ढंग से मनाया जाता है। लोग साझा आंगन में चालदा महासू के नामित ‘उकले’(मशालें) जलाते है और लोक गाथाओं व लोक नाट्यों का प्रस्तुतिकरण होता है। बूढ़ी दिवाली पर सभी स्थानों पर मशालें जलाकर वीर रस आधारित ‘लिंबर’ व ‘होलाच’ लोकनृत्य वास्तव में अंधेरे को परास्त कर रोशनी की ओर जाने का परिचायक है। यह उत्सव ग्रामीण लोक जीवन की अभिव्यक्ति का माध्यम है। बूढ़ी दिवाली लोक संस्कृति में सामूहिक हर्षोल्लास का पर्व है, जो सामाजिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक विशिष्ठता रखता है। यह लोकोत्सव सृजनात्मकता एवं सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है।

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