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प्रेम


ईसा के समय की बात है। साल नाम का एक उद्दंड व्यक्ति भोले-भाले मछुआरों व अन्य लोगों को सताया करता था। ईसा के अनुयायियों को वह विशेष रूप से तंग करता था। एक बार ईसा मछुआरों के पास पहुंचे। उन्होंने उन सबको प्रेम से गले लगाया। मछुआरे अपना जाल छोड़कर ईसा के पीछे हो लिए। साल ने यह देखा, तो उसे बर्दाश्त नहीं हुआ। उसने मछुआरों को और सताना शुरू कर दिया। उनके जाल भी तोड़ दिए। कभी-कभी वह ईसा के शिष्य बने बुनकरों की बस्ती में पहुंच जाता और उनके करघे तोड़ डालता। ईसा को पता चला, तो उन्हें काफी दुख हुआ। उन्होंने प्रार्थना की, ‘साल को सद्बुद्धि मिले।’ साल एक दिन ईसा के सामने आया, तो ईसा ने उसे मुसकराकर देखा। उसे आश्चर्य हुआ कि ईसा को सब पता है, फिर भी उन्होंने क्रोध नहीं किया। वह घर जाकर सो गया। पहली बार उसे नींद नहीं आई। ईसा का प्रेम से सराबोर चेहरा उसे बार-बार दिखाई देता रहा। कुछ देर बाद उसे झपकी आई, तो उसे लगा कि सपने में ईश्वर कह रहे हैं, ‘साल, तुम मुझे क्यों सताते हो?’ साल ने कहा, ‘मैंने आपको कब सताया?’ प्रभु बोले, ‘तुम मेरे भक्त मछुआरों व बुनकरों को सताते हो। वे मुझसे अलग कहां हैं?’ इन शब्दों ने साल की आंखें खोल दीं। वह दूसरे दिन ईसा के पास पहुंचा और उनके पैरों में गिरकर क्षमा मांगी। ईसा ने उसे साल से पॉल बना दिया। आगे चलकर वह ईसा के महान शिष्य ‘सेंट पॉल’ के नाम से विख्यात हुए। 

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