! !

शब्द

0 COMMENTS
खो गए हैं
कुछ शब्द मेरे
जो है मेरे समीप
रहते थे आसपास मेरे ही,
मां के शब्द
भाई के शब्द
दोस्तों के शब्द
आत्मीय, प्रेम
और स्नेह के शब्द,
कहाँ होंगे
क्यों खो गए वे शब्द,
कहना चाहता हूँ
ढेरों कहानियां कविताएं
कुछ आपबीती
और कुछ जगबीती
परंतु वो शब्द खो गए हैं,
ढूंढता रहता हूं उन्हें
कहीं तो होंगे ही
मिलेंगे जरूर , है ये आस,
तब मैं शामिल हो जाऊंगा
तुम्हारी महफ़िल में
तुम्हारे कहकहों में
अभी मैं ढूंढ लूं उन्हें,
तुम भी देखना
तुम्हारे पास ही तो नहीं कहीं
वो शब्द
जो खो गए है
और ढूंढ रहा हूँ जिन्हें
मैं आसपास।

पहचान लेना

0 COMMENTS
शहर से तेरे गुजरुं  तो पहचान लेना
सदा अजनबी रहा, आज मान लेना।
यूं कभी रुसबाई नहीं होती किसी की ,
कसूर तो तुम्हारा भी होगा जान लेना । 

जारी

मैं फिर से बच्चा होना चाहता हूँ

0 COMMENTS
मैं फिर से बच्चा होना चाहता हूँ,
मैं फिर से सच्चा होना चाहता हूँ।

वाह, मौका परस्त लोग, लोगों की फितरत,
मैं फिर से झंझटों से दूर होना चाहता हूँ।

पसन्द नहीं तुम्हे मेरी आज़ाद ख्याली,
मैं फिर से संजीदा होना चाहता हूँ।

शिकायत जायज कि बिगड़ा गया हूं,
मैं फिर से अच्छा होना चाहता हूं।

चीनी खत्म है चलो पड़ोसी से मांग लें,
मै फिर से गुजरा ज़माना होना चाहता हूं।

खो गए हैं खेल खिलौने सारे मेरे,
मैं फिर से मां की गोद में सोना चाहता हूँ।

दर्द का समंदर उमड़ता घुमड़ता है भीतर,
मैं फिर से ज़ोर से रोना चाहता हूं।

मत दिखा सजे सजाये आलीशान मकान मुझे,
मैं फिर से बच्चों के लिए घर होना चाहता हूँ।

(जारी)

मैं आऊंगा

0 COMMENTS
आऊंगा जरूर मैं
तुम व्यथित मत होना,
सभागार की
अंतिम पंक्ति में 
खामोशी से तुम्हे सुनता
मैं ही होऊंगा,
उस सभागार से
प्रस्थान सर्वप्रथम
मैं ही करूँगा,
तुम व्यथित मत होना
आऊंगा जरूर मैं... 

तुम कहाँ हो....

0 COMMENTS
कहाँ तो तुम
देख रही हो न
वेदना, 
असहाय प्रयास
धीरे धीरे 
समाप्त होता जीवन,
खत्म होती जिजीविषा, 
एकाकी होते रिश्ते, 
धूमिल होते नाते,
तुम देख रही हो न माँ....

मक्की

0 COMMENTS
- आजकल मक्की लगी होगी खेत में 
- जी सर 
- दो एक ले आना
- सर कल खेत में सांप दिखा था शाम को डर लगता है 
- अपनी मम्मी के साथ जाइयो 
- नहीं सर जी दादी को भेजूंगा ......

सतलुज

0 COMMENTS
सतलुज निष्प्राण हो गई 
ममता पाषाण हो गई।

सीना हो रहा निरंतर छलनी
वीरानगी अब प्राण हो गई।

संस्कृति हो रही रोज विलुप्त
वीभत्सता अब विज्ञान हो गई। 

जीवन की आशा है कम कम 
अंधेरा, सिसकियाँ जान हो गई। 

पहाड़ सिसकता है अन्तस है सूखा
पानी की एक बूंद अरमान हो गई। 

दौड़ते घूमते देखते है सब
निर्जीव सेल्फी शान हो गई।

(कल्पा यात्रा के दौरान कड़छम के पास )

लेखा जोखा



आपके पधारने के लियें धन्यवाद Free Hit Counters

 
? ! ? ! INDIBLOGGER ! ? ! ? ! ? ! ? ! ? हिंदी टिप्स ! हिमधारा ! ऐसी वाणी बोलिए ! ? ! ? ! ब्लोगर्स ट्रिक्स !

© : आधारशिला ! THEME: Revolution Two Church theme BY : Brian Gardner Blog Skins ! POWERED BY : blogger