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हाइकु

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(1)
                         
बड़े सपने

छोटे छोटे अपने
बड़े बेगाने

(2)

माता ताकती

एकटक देखती
आएगी पाती

(3)


विरोध करे
जीवन अवरुद्ध
वायु अशुद्ध

(4)

प्रेम अतुल
अपरिभाषित है

स्वच्छंद प्रेम

(5)

समझे कौन
अंतर्वेदना मेरी
हैं सब मौन

संवेदनाओं की बयार है काव्य संग्रह ‘ननु ताकती है दरवाजा' --- मनोज चौहान

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'ननु ताकती है दरवाजा’ वरिष्ठ साहित्यकार रौशन जसवाल ‘विक्षिप्त’ जी का हाल ही में प्रकाशित प्रथम काव्य संग्रह है । उनकी वर्षों की साहित्य साधना का परिणाम है यह कविता संग्रह l अपने आस-पास के परिवेश को गहनता से महसूस कर और जीवन के संजीदा अनुभवों को कलमबद्ध करके उन्होंने पाठकों को यह सौगात दी है, जिसे पढ़कर पाठक बहुत गहरे तक डूबता चला जाता है और कई कविताओं में खुद को ढूंढने की कोशिश करता है  l किसी भी संग्रह या कृति की महता तभी है जब एक साधारण पाठक या आम जनमानस उससे जुड़ाव महसूस करे और इस कसौटी पर यह संग्रह खरा उतरता है l

 प्रस्तुत संग्रह में छोटी - बड़ी 64 कविताएँ संकलित हैं, जो कि अलग- अलग कालखंड में रची गई हैं l वर्तमान में हिमाचल प्रदेश शिक्षा विभाग में उप- निदेशक के पद पर कार्यरत जसवाल जी 1983 -84 से साहित्य कर्म से जुड़े हैं और लघुकथा लेखन में भी उनका विशेष दखल रहा है, जिसके परिणामस्वरुप उन्हें कई संस्थाओं द्वारा कई सम्मानों से भी नवाजा जा चुका है l

संग्रह की पहली ही कविता 'वो क्षण' में कवि ने स्पष्ट किया है कि सर्वप्रथम जिस समय में उनके भीतर सृजन का बीज अंकुरित हुआ था,उस समय को उनके लिए बताना कितना कठिन है । कविता की पंक्तियां देखें :

बताना कठिन है
वो क्षण कौन से थे
जब सहसा अनुभव किया मैंने
हिलोरे ले रहा है विचारों का समुद्र
मेरे भीतर
और करनी है
अभिव्यक्ति जिसकी मुझे शब्दों में l

यह सच है कि एक आदमी के भीतर एक नहीं बल्कि अनेक चेहरे होते हैं, जिसे कोई और नहीं बल्कि व्यक्ति विशेष स्वयं ही महसूस कर सकता है l कवि की दृष्टि बहुत ही सूक्ष्म है, जिसे वो अपनी ‘चेहरा’ नामक कविता में स्पष्टतया उकेरते नज़र आते हैं  । कविता की बानगी देखें :

आज देखिएगा टकटकी बांधकर
चेहरे के भीतर
एक और चेहरा नजर आएगा तुम्हें
छल और कपट से भरा हुआ
जरुर देखिएगा l

गरीबी और अभावग्रस्त जीवन हालातों को बदतर कर देते  है और  मजबूर भी l हमारे समाज की असम्बेदनशीलता की पोल खोलते हुए कवि ‘उसका मासूम चेहरा’ नामक कविता में कहते हैं कि :

आज फिर देखा है उसे
मिट्टी से सने पाँव
चीथड़ों को लिए हुए
आराम सुखों का छोड़ कर
चल दिया काम की तलाश में
ढूंढने लगा जीवन
उस कूड़े के ढेर में
गिराता था सारा मोहल्ला
गंदगी जिसमें l

‘मैं की व्यथा’ नामक कविता सोचने पर विवश करती है, जिसे पढ़ते हुए पाठक वर्तमान, भूत और भविष्य के भंवर में डूबता चला जाता है । कविता की पंक्तियों पर जरा गौर करें :

नदियों के छलछल बहते जल में
रेत की तपिश में
और सरिता के किनारे
जहाँ कभी खेलते थे बच्चे मेरे गाँव के
और उन्ही में मैं था
परन्तु अब अपना ही
झुर्रियों वाला चेहरा देखता हूँ l

घर एक ऐसा स्थान होता है जिससे हर इंसान की बचपन से लेकर बड़े होने की स्मृतियाँ जुड़ी होती है और यह हमारे पूर्वजों की अमूल्य धरोहर होता है l  अपने घर से जुड़ी इन्हीं समृतियों को कवि ने ‘घर’ नामक कविता में उद्घाटित किया है l समाज में अपराधिक प्रवृति जब बढ़ जाती है तो एक माँ के लिए अपने बेटे की चिंता जायज है, जिसे कवि ने ‘अँधेरा’ नामक  कविता में निम्न पंक्तियों के माध्यम से उजागर किया है :

सुबह जब मैं घर से निकलता हूँ  तो
माँ कहती है, बेटा जल्दी आ जाना
अँधेरा होने से पहले
क्योंकि मेरे शहर में
जवान लड़के -लड़कियां गुम होने लगे हैं
मेरे शहर में अब
इंसानी भेड़ियों ने घर बना लिए हैं
और ढूंढने लगते हैं खुराक
अँधेरा घिरते ही l

सत्य वास्तव में ही कड़वा होता है और कई बार पीड़ादायक भी । ‘तुम्ही कोई शीर्षक दो’ नामक कविता में कवि एक प्रश्न खड़ा करते  हैं, जिसे कविता की निम्न पंक्तियों से साफ समझा जा सकता है :

उस महल की नीवं का दर्द
कोई नहीं समझ सकता
जिसके आधार में हों करोड़ों चीखें
इतनी कराहें कि कल्पना मात्र से सिहर उठे हम
उन लोगों की सुबह कैसी होती होगी
जिन्हें चखना पड़ता है स्वाद
सिर्फ कराहों और चीखों का ?

कई बार जीवन में ऐसे अवसर भी आते हैं जब  गिले – शिकवे, शिकायतें और गलतफहमियाँ हावी हो जाती हैं l  इन सबके  बाबजूद भी कवि का संवेदी मन कराह उठता है l मानव हृदय की विशालता को प्रकट करती कविता ‘उसका सच’ की ये पंक्तियाँ भीतर तक स्पर्श करती हैं :

बहुत दिनों तक
जब देख नहीं पाता हूँ उस शख्स को
जिससे मुझे बेहद नफरत है
तब सालने लगती है मुझे एक चिंता
और मैं पूछ बैठता हूँ उदासी से
वो ठीक तो होगा न ?

पारिवारिक जरूरतें जब गाँव में पूरी नहीं हो पाती तो व्यक्ति शहर या महानगर का रुख करता है, मगर शहर की भीड़ और तेज रफ़्तार जिंदगी में कहीं खो सा जाता है l  और कभी -कभार हादसों का भी शिकार हो जाता है l  ‘महानगर’ नामक कविता में कवि ने इसी पीड़ा को उजागर किया है l कुछ इस तरह से कि :

महानगर क्या तुम थोडा रुकोगे
गाँव तुमसे बतियाना चाहता है
गाँव पूछना चाहता है
ढेरों प्रश्न तुमसे
पिछले वर्ष
रामू की बेटी तुमसे मिलकर
कहाँ खो गई ?

शब्दों की सही ताकत को परिभाषित करती और सामाजिक बदलाव और क्रांति का आवाहन करती लघु मगर मारक कविता ‘शब्द’ में वे लिखते हैं: 

क्रांति आती नहीं
उदास और मुरझाए चेहरों से
क्रांति लाते नहीं
प्रेयसी के आगोश में छुपे युवक
क्रांति के लिए शब्दों में रमना पड़ता है
और लिखना होता है लहू से क्रांति
सिर्फ क्रांति !

संग्रह की शीर्षक कविता ‘ननु ताकती है दरवाजा’ एक भावना प्रधान कविता है, जो बाल मन की निश्चलता और भोलेपन को खुबसुरती से उकेरती है l कई बार बच्चे अपने इसी नैसर्गिक गुण के कारण बड़ों को भी बहुत कुछ सीखा जाते हैं  और सोचने पर मजबूर कर देते हैं l कविता की पंक्तियाँ देखें :

कैसे सीख लिया है ननु ने इन्तजार करना
अब मैं झूठा बनता जा रहा हूँ
जब भी छोड़ना होता है ननु को
कह डालता हूँ एक भारी झूठ
ननु करती रहती है प्रतीक्षा
दोपहर बाद तक l

रोग ग्रस्त व्यक्ति जब अस्पताल में  दाखिल होता है तो उसके दिमाग में अनेक तरह के झंझावात चलते रहते हैं l इसी मनोस्थिति को कवि ने बहुत गहरे से महसूस किया है l भीतर तक छूने वाली ‘जिजीविषा’ नामक कविता की पंक्तियों पर गौर करें   :

जिजीविषा निरंतर देखती रहती है
सिरिंज में बूंद- बूंद रक्त
और सह लेती है
डायलिसिस की वेदना
नर्सों की अनावश्यक डांट l

गाँव से दूर जब वहां बिताएं बक्त की स्मृतियाँ दस्तक देती हैं तो मन में एक टीस सी उठती है और मन करता है की फिर से वहीं उस खुशनुमा बक्त में लौट आएं l कवि के गाँव, खेत, खलिहानों और माँ  के प्रति गहरे जुड़ाव को दर्शाती कविता ‘वादे’ भाव-विभोर कर जाती है l कविता की निम्न पंक्तियां देखें :

बहुत दिनों से देख नहीं पाया हूँ
गोबर से लिपीपुती दीवार
और देखी नहीं किसी आँगन में तुलसी
बहुत दिनों से भेड़ों के साथ
जंगल नहीं गया हूँ
भूल गया हूँ
मक्की की रोटियाँ और लस्सी का स्वाद
गाँव से शहर आकर
दूर हो गया हूँ मैं ‘माँ’ से l

इसके अलावा संग्रह में  ‘सवाल’,‘औरत’ , ‘चुप ही रहना’, आदि कविताएं नारी विमर्श पर लिखी गई हैं जो कई सवाल खड़े करती हुई भीतर तक उद्देलित कर जाती हैं । ‘अपनी जमीन अपने लोग', ‘मैं डर गया हूँ’, ‘कथानक’, ‘नेपथ्य से’, ‘माठू’, ‘पराजय’, ‘इबारतें’, ‘दिनचर्या, ‘गिद्ध’, ‘पहाड़’, ‘अस्पताल’, ‘योग्यता’, विद्यार्थी  नामक कविताएं भी बहुत ही सशक्त बन पड़ी हैं ।

रौशन जसवाल 'विक्षिप्त' जी के लेखन का फलक असीम है । कविता का मूल तत्व संवेदना उनकी कविताओं की विशेषता कही जा सकती है l उनकी कविताओं में जहां एक ओर दार्शनिकता एवं मानवीय मनोविज्ञान का ताना- बाना है तो वही दूसरी ओर आम जनमानस और समाज की चिंताएं भी उद्घाटित होती हैं । पर्यावरण के प्रति भी वे अपनी कविताओं में मुखर हैं l

प्रस्तुत संग्रह पेपर बैक में है, जिसकी छपाई उम्दा दर्जे की है । 88 पृष्ठीय इस पुस्तक की कीमत मात्र 100 रुपए है । यह संग्रह बोधि प्रकाशन, जयपुर (राजस्थान) से प्रकाशित हुआ है । यह पुस्तक अमेज़न से भी ऑनलाइन मंगवाई जा सकती है । आशा है कि यह काव्य संग्रह सुधी पाठकों के मध्य अवश्य सराहा जाएगा । इस संग्रह के प्रकाशन हेतु कवि रौशन जसवाल 'विक्षिप्त' जी को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं !
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मनोज चौहान, एसजेवीएन कॉलोनी दत्तनगर, रामपुर बुशहर, शिमला (हिमाचल प्रदेश) -172001

पहाड़ चुप है

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शहर
गमलों से निकल कर
निहार रहा है पहाड़ो को,

शहर देख रहा है
प्रकृति की अठखेलिया
स्वच्छ होता नभ
मनमोहक चांदनी
जीवों वनस्पतियों की 
चहलकदमी
और  
कर रहा है
स्वयं से मंथन,

लेकिन पहाड़
उदास है
गमगीन है
क्योंकि
वो जानता है
स्तिथियाँ बदल जाएगी
एक अंतराल के बाद
वो रह जायेगा एकाकी,

पहाड़ जानता है
ये प्रसन्नताएँ उल्हास
ये मन्त्रणाएँ
क्षणिक है
खो जाएगा ये सब
कहीं सुदूर
और
इन्ही गमलों में
खो जाएगा शहर
 पहाड़ चुप है
हमेशा की तरह।

गुलदस्ता

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कुछ  दिन पूर्व गमलों के लिए फूल के पौधें लाया था। मोल भाव करने के बाद पांच पौधें लिए। पौधे वाला कहने लगा, भाई साहब इन्हें इक्कठे एक ही गमले में लगाना। गुलदस्ता बनेगा तो अच्छा लगेगा। 
पौधे वाले कि बात मानते हुए सभी पौधे एक ही गमले में लगा दिए।
आज चेक किया तो एक पौधा सूख गया था। न चाहते हुए भी उसे उखाड़ना पड़ा। 
और फैंक दिया कूड़ेदान में ... ।

मुर्गा

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एक दड़वा। कुल चार मुर्गे। चार छोटे एक बड़ा। बड़ा मुर्गा इन चार छोटे मुर्गों की देखभाल करता, बाहरी मुश्किलों से सुरक्षा देता। 
समय बीतता गया। चारों छोटे मुर्गे बड़े हो गए। बड़ा मुर्गा अब बूढ़ा हो चला था। चार मुर्गे में एक ज्यादा जागरूक हो गया, बात बात पर हुकुम चलाने लगा था, बड़ा मुर्गा उसे समझता और सभी को मिल कर रहने की सलाह देता। 
उस बड़े होते मुर्गे को उसकी बातें अच्छी न लगती थी। उसने अन्य तीन मुर्गो को भड़काना शुरू कर दिया। उनको वो बड़े बड़े सपने दिखाने लगा। वो भी उसकी बातों में आ ही गए। अब वो मुखिया बन गया। 
अब उन चारों ने उस बड़े मुर्गे को धमकाना शुरू कर दिया। वो बड़ा मुर्गा अब अकेला सा हो गया।
अब वो उस दड़वे में अकेला हो गया। कोने में अकेला गुमसुम रहता है। चुपचाप सोचता है गलती कहाँ हो गई।

ठंड काफी हो गई है

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शाम ऑफिस से निकला तो घर के लिए ओल्ड बस स्टेंड से बस ली। सीट की आपाधापी में किसी तरह से सीट मिल ही गई।
सीट पर एक भाई साहब बैठे थे मुझे चुपचाप देख उसने बातों का सिलसिला शुरू कर दिया।

- बर्फ कुछ कम ही पड़ी है
- जी
- पहले वर्षा होनी चाहिए थी बगीचे के लिए अच्छी रहती है।
- जी
- राजा साहब इस बार चुनाव लड़ेंगे क्या?
- क्या पता
- जय राम जी अच्छे आदमी है
- जी 
- विक्रमादित्य अब अच्छा भाषण देने लगे है
- जी
- तरक्की तो अनुराग ने की है
- जी
- आपका गांव कोन सा है
-- जी .... है
- वहां के तेज बन्दे है
- पता नहीं 
- यहां कहा रहते हो
- जी .... में रहता हूँ।
- अकेले रहते हो
- नहीं बच्चें साथ रहते है
-  पढ़ते होंगे
- जी
- किस डिपार्टमेंट में काम करते हो
- शिक्षा विभाग में 
- मास्टरों की सैलरी तो बहुत अच्छी है। आपकी कितनी है
- जी, गुजारा चल रहा है
- टेक्स कितना काटते हो
- जी ... हर महीने 
- आप कहाँ काम करते हैं, मैनें पूछा
- मैं सेटलमेंट में था। 
- जी
- ठंड काफी हो गई है
- जी
- रम लगाते हो 
- ढली वाले तैयार हो जाओ कंडक्टर की आवाज़ सुनाई दी
- मेरा स्टेशन आ गया था। उस व्यक्ति की बातों के सिलसिले का मूल तत्व मुझे समझ आ गया था।

घर ढूंढ़ता है कोई

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इस शहर में घर ढूंढता है कोई,
क्या यहां अपना रहता है कोई।

उफ ये दौड़ , ये भागमभाग,
चुपचाप सा बहता है कोई।

बदहवास ज़िंदगी का सबब है क्या,
अपना ही पता यहां पूछता है कोई। 

एक दूसरे की साँसों से बंधे है हम,
फिर भी जुदा जुदा सा रहता है कोई। 

चेहरे तो हैं सभी जाने पहचाने, 
फिर भी अपना लापता है कोई। 

पूछ रहा हूं मैं उससे उसी का नाम,
मुझे ही विक्षिप्त कहता है कोई। 

जारी....

लेखा जोखा



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