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जिजीविषा

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जिजीविषा
थक जाती है
लम्बी कतार देख, 
और ढूंढती है
कमरा
जो लिखा है
पर्ची पर
कमरा 415, 223, 115,
जिजीविषा
हैरान परेशान है
लोगों की भीड़ देख कर,
और उतरती है सीढ़ियां
धीरे धीरे 
निढाल होती जिजीविषा 
लुढ़क जाती है
स्टेरचर पर
अगले दिन तक
फिर से
दौड़ने और कमरा ढूढ़ने के लिए... 

रुलाया नहीं करते

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वेबजह घर से यूँ जाया नहीं करते
मां को अपनी रुलाया नहीं करते।

उदास है, चिंतित है सब यहां 
रिश्तों को यूं पराया नहीं करते ।

बहने देखे रंगों और राखी को एकटक
बिन अपनो के उत्सव भाया नहीं करते। 

भर जाती है रौनके तुम्हारी  मुस्कराहटों से 
लुकाछिपी से अपनों को सताया नहीं करते ।

बदरंग, दोगली, अहसानफरामोश  है ये दुनिया
राह चलते को कभी मेहमान बुलाया नहीं करते । 

जात गाली हो गई

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जात अब  जात नहीं रही गाली हो गई 
गरीब की जोरू सबकी साली हो गई है।
जिसे भी देखिए उगल देता है बहुत कुछ 
रिश्‍ते नाते जिन्‍दगी सवाली हो गई है।

आप क्‍या सोचते हो भला कर रहे हो
सेवाभाव मदद की बातें मवाली हो गई है।

रूतबा पद सम्‍मान सब बेकार की हैं बातें 
पल पल अब सांसो की रखवाली हो गई है।

दर्द है वेदना और जलालत है 
झूठे सब , मुस्कुराहटें जाली हो गई है।

बच कर रहना जनाब ये अजब शहर है
इश्‍क मुहब्‍बत पुरानी कव्‍वाली हो गई है।

मुस्‍कुरा रहे हो ग़ज़ल कोई पुरानी पढ़ कर
विक्षिप्‍त की बातें जनाब निराली हो गई है।

बिल्ली

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महिला दुकान से सामान ले कर धीरे धीरे घर की तरफ चल ही रही थी कि सामने से बिल्ली आ गई। 
दोनो ही रुक गए। बिल्ली ने रुकी हुई महिला को देखा और अपने रास्ते निकल गई। महिला अब भी रुकी हुई थी प्रतीक्षा कर रही थी कोई उससे पहले निकले तो तब वह भी जाये। 
और बिल्ली  को मैं काफी दूर मस्त चाल से मुस्कुराते हुए जाते देख रहा था।

कैसी लोहड़ी कैसा उत्सव

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कैसी लोहड़ी कैसा उत्सव
गुम अपने और चुप है सब
लोहड़ी गाना और मांगना लोहड़ी
किस्से कहानियों की बात है अब
अपने अपने दड़बों में दुबके हैं
अपनी बात अपनी सौगात है अब

आजकल कहाँ रहता हूँ मैं

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पूछते हो अब कहां रहता हूँ मैं 
जहां कोई नहीं वहीं रहता हूँ मैं ।

भीड़ है, लोग हैं सब ही तो हैं यहां, 
एकाकी हूँ खामोशी से बहता हूँ मैं ।

पुष्प पसन्द है सबको, लेते है सुंगध
बंजर हूँ, वेदना कांटों की सहता हूँ मैं ।

खूब सजाए है महल तुमने कैसे कैसे,
किराए के मकां को घर कहता हूं मैं।

चलो अच्छा है अब भ्रम तो टूटा , 
रिश्तों  की ओट में बिकता रहा हूँ मैं ।


छला है अपना बन कर सभों ने,
यूं ही नहीं विक्षिप्‍त सा घूमता हूं मैं। 


इक दिन होना है

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ये तो इक न इक दिन होना है,
खेत नऐ रिश्‍तों का अब बोना है।

नियम कायदे सब, है मेरे लिए,
बाहरी आदमी हॅू मुझे बस कोना है।

देख के हाथों की आड़ी तिरछी लकीरे,
कहा उसने, इससे भी बूरा होना है।

आंखों के कोनों से बहता रहता है पानी,
यही सरमाया है, यही तो मेरा सोना है।

छल गया जो अपना बन कर, कह कर,
आज समझा कद में वह बहुत बौना है ।

विक्षिप्‍त को जि़ंदगी में देखना है क्‍या क्‍या,
संसार, गिरना गिराना पाना और खोना है।

लेखा जोखा



आपके पधारने के लियें धन्यवाद Free Hit Counters

 
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