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मैं आऊंगा

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आऊंगा जरूर मैं
तुम व्यथित मत होना,
सभागार की
अंतिम पंक्ति में 
खामोशी से तुम्हे सुनता
मैं ही होऊंगा,
उस सभागार से
प्रस्थान सर्वप्रथम
मैं ही करूँगा,
तुम व्यथित मत होना
आऊंगा जरूर मैं... 

तुम कहाँ हो....

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कहाँ तो तुम
देख रही हो न
वेदना, 
असहाय प्रयास
धीरे धीरे 
समाप्त होता जीवन,
खत्म होती जिजीविषा, 
एकाकी होते रिश्ते, 
धूमिल होते नाते,
तुम देख रही हो न माँ....

मक्की

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- आजकल मक्की लगी होगी खेत में 
- जी सर 
- दो एक ले आना
- सर कल खेत में सांप दिखा था शाम को डर लगता है 
- अपनी मम्मी के साथ जाइयो 
- नहीं सर जी दादी को भेजूंगा ......

सतलुज

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सतलुज निष्प्राण हो गई 
ममता पाषाण हो गई।

सीना हो रहा निरंतर छलनी
वीरानगी अब प्राण हो गई।

संस्कृति हो रही रोज विलुप्त
वीभत्सता अब विज्ञान हो गई। 

जीवन की आशा है कम कम 
अंधेरा, सिसकियाँ जान हो गई। 

पहाड़ सिसकता है अन्तस है सूखा
पानी की एक बूंद अरमान हो गई। 

दौड़ते घूमते देखते है सब
निर्जीव सेल्फी शान हो गई।

(कल्पा यात्रा के दौरान कड़छम के पास )

समीक्षा बैठक

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काम ठीक न चलता देख आपातकालीन बैठक का निर्णय हुआ। आनन फानन में बैठक आयोजित की गई।  कमियों पर लंबे लम्बे भाषण दिए गए और  दोषियों की सूची तैयार की गई। निर्देशों की सूची पारित कर बैठक ख़ास पार्टी में तब्दील हो गई और मेज पर अब प्लेटों में सजे मुर्गों की बारी थी।

समुद्र

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समुद्र
बिलखता है
तड़पता है
छटपटाता है 
लेकिन
लौट आता है वापिस
टकरा कर
किनारों से 
उदास और गुमसुम।

जिजीविषा

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जिजीविषा
थक जाती है
लम्बी कतार देख, 
और ढूंढती है
कमरा
जो लिखा है
पर्ची पर
कमरा 415, 223, 115,
जिजीविषा
हैरान परेशान है
लोगों की भीड़ देख कर,
और उतरती है सीढ़ियां
धीरे धीरे 
निढाल होती जिजीविषा 
लुढ़क जाती है
स्टेरचर पर
अगले दिन तक
फिर से
दौड़ने और कमरा ढूढ़ने के लिए... 

लेखा जोखा



आपके पधारने के लियें धन्यवाद Free Hit Counters

 
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