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गुरुवार, फ़रवरी 2

सुंदरता

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उसकी बातें उसकी सुंदरता की तरह ही आकर्षक होती थी। कोई भी उससे मिलता तो उसका मुरीद हो जाता। मैं भी उसकी उसकी बातों से बेहद प्रभावित रहा।
कार्यालय में सभी स्टाफ सदस्य वार्षिक उत्सव पर विचार विमर्श कर रहे थे कि सेवादार ने सूचना दी कि गांव से उसके सास ससुर मिलने आये है। ।
मैंने उससे आग्रह किया कि आप सास ससुर से मिलने जा सकती हैं। उसने बड़े ही रूखे स्वर में तुरंत  इनकार कर दिया और कहने लगी उनका लड़का मिल लेगा । उनके शरीर से तो गांव वाली गंध आती है।
मैं हैरानी से उसका चेहरा ताकता रह गया। उसकी सुंदरता अब मुझे कुरूपता नज़र आ रही थी।

तबियत

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तबियत नासाज़ है तुम दुआ करना
मुझे और जीना है तुम दुआ करना

आना जाना है एक कटु सत्य
चलते जाना है तुम दुआ करना

उड़ता रहू पंख न थके मेरे
लगे न प्यास तुम दुआ करना

बहुत काम करने है अभी
कुछ न रहे शेष तुम दुआ करना

सुनी है ढेरों झूठी कथाएं यहाँ
मैं सच पर रहूँ तुम दुआ करना

इक दौड़ है एक खेल है जीवन
जीतता रहूँ मैं तुम दुआ करना

यारब ये अफवाहों  का दौर कैसा
बेगुनाही रहे मेरी तुम दुआ करना

विक्षिप्त हूँ समझता हूँ  बेरुखी तुम्हारी
मर कर जी जाऊं तुम दुआ करना

मंगलवार, जनवरी 31

मीत

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छोड़िये कटुता मीत बन जाइए                                                          
पराजित  की  जीत बन जाइए                                                     
क्षण भंगुर जीवन का क्या है पता                                             
फैलाकर मधुरता संगीत बन जाइए

शनिवार, जनवरी 28

मित्रता

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यूँ तो उससे कोई पुराना परिचय नहीं था, मात्र इतना कि वो दूकानदार था और मैं उसका ग्राहक। रोज उससे दूध की थैली ले जाता और दुआ सलाम हो जाता। उसका हमेशा का आग्रह की कभी घर आइयेगा चाय पर, मैं कभी पूरा नहीं कर पाया।
उसकी मुस्कुराहट उसका व्यवहार उसकी घनिष्ठ मित्रता प्रदर्शित करती थी।
उस दिन छोटे रूपये न होने के कारण पांच सौ का नोट उससे देना चाहा । देखते ही बोला सर जी दूध तो ख़त्म हो गया। अब चालीस रूपये के चक्कर में पांच सौ का नोट कौन स्वीकारता। मेरे दुकान से बाहर निकलते ही उसने दूसरे ग्राहक को दूध की थैलियां दे दी। उस ग्राहक ने उससे पूछा ये तो आपके नियमित ग्राहक है फिर इस क्यों? उसने मुस्कुराते हुए उस ग्राहक को जवाब दिया जनाब पांच सौ से चार सौ साठ रूपये भी तो वापिस करने थे।
उसकी मुस्कुराहट और घनिष्टता का रहस्य मेरे सामने बिखरा पड़ा था।

सोमवार, जनवरी 23

ममत्व

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संसार तब तक
ही सुन्दर है
जब इसे
देखते है
माँ की आँखों से
संसार
भयानक है
डरावना है
अवसरवादी है
जब भी देखा
अपनी आखों से
संसार में मात्र
ममत्व  सुन्दर है
और कुछ भी नहीं

शुक्रवार, जनवरी 20

सर्दियाँ

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ऊन
और सिलाइयों के बीच
अंगुलियां
बुन डालती थी
जुराबें सर्दियों के लिए,
टीवी पर
निरतन्तर देखते
धारावाहिक के बीच ही
देख लेती भी
जुराबों और पाँव का नाप,
नई पुरानी ऊन से
बुने जाते थे
स्वेटर रंग बिरंगे,
इन्ही बुनते उधड़ते
स्वेटरों जुराबों से ही
दी जाती थे
ढेरों नसीहतें,
रंग बिरंगी
जुराबे स्वेटरे
सुना डालती थी
समाज का रंग ढंग
रिश्तों नातों की मिठास
ये
उस समय की बात है
जब ज़िंदा थी माँ... ।

बुधवार, अक्तूबर 12

शब्‍द

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शब्‍द
कुछ अपने
कुछ पराये,
शब्‍द 
कुछ छोटे
कुछ बड़े,
शब्‍द
कुछ साथ
कुछ अकेले,
शब्‍द
कुछ थुलथुले
कुछ बुलबुले,
शब्‍द ही तो
मात्र शब्‍द
नि:शब्‍द ।।

लेखा जोखा



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