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शब्द परिचित से

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अभी अभी
उतरे हैं कुछ शब्द
अंधेरी पथरीली 
सीढ़ियों से, 
शब्द
कुछ परिचित 
कुछ जाने पहचाने, 
एकाएक खो गए
कहीं अंधकार में,
कैसे ढूंढूगा
ओझल शब्द
जो लगते थे
मेरे अपने...

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भुला दिए सब गिले शिकवे तूने
दिल में एक दो मलाल रहने दे

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भीतर घुटा बाहर निकलता क्यों नहीं,
जमा हुआ  सीसा पिघलता क्यों नहीं ।

पैरोडी

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घर से बहुत दूर है मदिरालय चलो यूँ कर ले,
किसी स्कूल के शिक्षक को धमकाया जाए।

डिल

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अच्छा है कहीं दिल लगा कर रखें
अकेले यूँ ज़िन्दगी बसर नहीं होती।

दीजिये लीजिए जो भी, श्रद्धा से करें
बिन भावना के दुआ असर नहीं होती ।

जिजीविषा

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जिजीविषा
लेती है परीक्षा हमेशा,
हर मोड़ पर
हर पग पर,
जिजीविषा
करती रहती है मुकाबला
वार्ड से
स्ट्रेचर से
ऑक्सीजन से
वेंटिलेटर से
निरंतर चुभते
बेधते इंजेक्शनों से,
जिजीविषा
रुकना नहीं चाहती
वो मिलना चाहती है
सभों से अपनो से,
दौड़ती ही रहेगी हमेशा
जिजीविषा, एकाकी ही....

समुद्र

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समुद्र
बिलखता है
तड़पता है
छटपटाता है
लेकिन
लौट आता है वापिस
टकरा कर
किनारों से
उदास और गुमसुम।

लेखा जोखा



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