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बुधवार, अक्तूबर 12

शब्‍द

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शब्‍द
कुछ अपने
कुछ पराये,
शब्‍द 
कुछ छोटे
कुछ बड़े,
शब्‍द
कुछ साथ
कुछ अकेले,
शब्‍द
कुछ थुलथुले
कुछ बुलबुले,
शब्‍द ही तो
मात्र शब्‍द
नि:शब्‍द ।।

बुधवार, जुलाई 6

मच्छर

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मच्छर
छोटे बड़े मंझलें 
करते हैं बहुत तंग
नहीं देते सोने
छोटे बड़े मंझलें
मच्छर।

सोमवार, जुलाई 4

सपने

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छोटे छोटे सपने
कुछ कुछ बेगाने
थोड़े थोड़े अपने।

रविवार, जून 26

ना कोई शिकायत

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ना कोई शिकायत ना कोई गिला,
एकाकी था, हूँ आज भी अकेला ।
होना,घटना, है सब प्रभु इच्‍छा,
आना जाना दुनिया इक मेला।

अधुरेे पन्‍नेे

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‪#‎अधूरे_पन्ने‬
(जीवन यात्रा पर प्रकाशनाधीन पुस्तक से)
वैसे मैं ओझा डाउ तंत्र मंत्र की बातों पर विश्वास कम ही करता। लेकिन पिछले वर्ष अस्वस्थ होने के कारण दवा और दुआ का दौर निरंतर चलता रहा है । वर्ष अप्रैल 2014 में गंभीर रूप से अस्वस्थ हुआ था दुसरे शब्दों में कहूँ तो मैंने मौत का साक्षात्कार किया । मेरे विद्यालय के सहयोगियों ने समय रहते मुझे स्थानीय अस्पताल पहुंचा कर चिकित्सा सहायता प्रदान की जिससे मैं स्वस्थ हो पाया।
दवा और दुआ सफर साथ साथ रहा । ग्रहों की दशा और दिशा जानने का प्रयास भी किया गया किसी ने कहा की किसी ओझा से भी बातचीत जरुर करें । बातचीत की गई तो बताया गया की आप पर नारसिंह लगाया गया है । किसने लगाया है ?इसका मात्र संकेत दिया गया की कोई औरत है जो आपको समाप्त करना चाहती है । अब मैं उस औरत को कहाँ खोजू और पुछू की बता मेरी खता क्या है है?
सोचता रहा इस पर विश्‍वास किया जाए या नहीं । मैं तो मात्र इतना समझता हूँ की देवी देवता किसी का अहित नहीं करते तो मेरा भी नहीं करेगें ।


‪#‎अधूरे_पन्ने‬
(जीवन यात्रा पर प्रकाशनाधीन पुस्तक से)
शाम कार्यालय से निकला ही था कि मदिरा पान किये एक व्यक्ति मिल गया। किसी वाहन को चलाता है शायद । आज छुट्टी थी उसकी। देखते ही आत्मीयता दिखाते मुझसे चिपक ही गया। घर की जल्दी ऊपर से हाथ न छोड़े। मैं मात्र हाँ जी हाँ जी करता छूटने की कोशिश करता रहा।
कहने लगा मास्टर जी आप बहुत अच्छे है लेकिन मैं बीन्ड(पंगेबाज) बन्दा हूँ । किसी तरह हाथ छुड़ा निकला और सोचता रहा ऐसे ही बीन्ड बंदे कभी भी कुछ कर सकते हैं । मास्टर तो एक निरीह प्राणी है उसकी औकात क्या?

अधुरे पन्‍ने

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‪#‎अधूरे_पन्ने‬
(जीवन यात्रा पर प्रकाशनाधीन पुस्तक से)
सुबह उठते ही गुनगुना पानी और टहलने, योगा करने का आदेश ये मीरा के दैनिक कामों में शामिल है। पानी पिया और एक दो चक्‍कर इधर उधर लगाए। फिर व्‍टस एप्‍प पर नमस्‍कार का दौर शुरू । फेसबुक पर अपडेट देखना । समय बीत जाता है तुरन्‍त।
मीरा व्‍यस्‍त हो जाती रसोई में । व्‍यस्‍तता सबकी है अपनी अपनी । वो सब के लिए कुछ न कुछ कर रही है मैं जो भी कर रहा हूं सिर्फ अपने लिए । इस यात्रा में अनेक बार ऐसा लगा मैं स्‍वार्थी हूँ कुछ नहीं कर पाता हूँ उसके लिए । मैं आत्‍मकेन्द्रित होता जा रहा हूँ । .........


‪#‎अधूरे_पन्ने‬
(जीवन यात्रा पर प्रकाशनाधीन पुस्तक से)
पदोन्नति के बाद बाहली स्कूल में कार्य भार ग्रहण था। एक दिन एक लड़का लगभग 11 बजे सुबह छुट्टी लेने। आ गया। मैंने पूछा क्यों चाहिए? वो बोला,"सर मुझे नींद आ रही है।" मेरे ये एक नया कारण था। इस तरह का छुट्टी का कारण पहली बार सुन रहा था।
मेरी उत्सुकता जागी मैंने पूछा नींद क्यों आ रही है? वो बोल,"सर रात को रामपुर में लवी का कार्यक्रम देखा तो सोया नहीं अब नींद आ रही है।
मैं निरुत्तर अपलक उसे देख रहा था.... ।


‪#‎अधूरे_पन्ने‬
(जीवन यात्रा पर प्रकाशनाधीन पुस्तक से)
शुरू से कविताओं में रूचि रही । नए रचनाकार भी सेना में भर्ती रंगरूट की तरह ही तो होते है। यूूं भी कविताओं को कौन सुनना चाहता है वही जाे इसमें रूचि रखता हो। कुछ लिखता तो मां को सुना देता प्रसन्‍नत होता। वास्‍तव में मां मेरी कविताओं की प्रथम श्रोता रही है। वो लगातार प्रोत्‍साहन भी देती रही।
(शेष पुस्‍तक में)


‪#‎अधूरे_पन्ने‬
(जीवन यात्रा पर प्रकाशनाधीन पुस्तक से)
जब भी मीरा को देखता हूं उसके बारे में सोचता हूं तो उसकी किस्‍मत के बारे में मेरे भीतर ही भीतर मंत्रणा करने लगती है। एक अपराध बोध सा लगने लगता है कि उसकी अस्‍वस्‍थता के लिए क्‍या कहीं मैं ही जिम्‍मेदार तो नहीं?
जीवन और मृत्‍यु के प्रश्‍न उसी को देख कर पूर्ण हो जाते है।
(शेष पुस

अधुरे पन्‍ने

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बाऊ जी की मृत्‍यु के बाद मां ने कभी भी किसी कमी का अहसास नहीं होने दिया। हम अपनी जिम्‍मेवारियों का बोध तक नहीं कर पाऐ थे। कोई चिंता नहीं। मां है न वो सब कर देगी । मदद के लिए छोटा भाई है । जीवन चल रहा था बिना किसी समस्‍या के और सुखद जीवन।
तीन साल पूर्व (अगस्‍त 2012) जब मां का भी निधन हो गया तो दुनियादारी का पता चला। बड़े सामने हो तो बच्‍चों को कोई चिंता नहीं होती । मस्‍त होते है अपने अपने में। लेकिन उनकी रिक्‍तता असहनीय होती है। लोगो के आचार व्‍यवहार में परिवर्तन हो जाता है। जीवन की सचाई का सामना करना होता है। मां के जाने के बाद कई बातें याद आने लगी जो उन्‍होने समझाते हुए कही थी। एक एक शब्‍द की महता का आभास होने लगा थ्‍ाा। जीवन के मायने क्‍या है उसका बोध होने लगा था।
आना और जाना जीवन का सत्‍य है। जो आया है वो महाप्रस्‍थान तो करेगा ही। इस यात्रा में कई अनुभव मिले । मीठे कड़वे सब तरह के



विभागीय आदेश पर एक इन्‍कवारी के लिए बनूना स्‍कूल जाना पड़ा । इससे पूर्व भी इन्‍कवारी का कार्य कर चुका था । साथ कार्यालय अधीक्षक, गणित के प्राध्‍यापक और प्रयोगशाला परिचर भी साथ थ्‍ेा। वापसी में

स्‍कूल में हर रोज नया ही अनुभव प्राप्‍त होता है। बच्‍चों के नए नए बाहाने भी सृजनात्‍मकता का रूप ही तो है। प्राय: ये बाहाने झूठ पर आधारित होते है जिन्‍हें बोल का छुटी ले ही लेते हैं और बाहर निकलते ही अपनी स्‍थानीय बोली में भी जरूर टिप्‍पणी करते हैं। वे नहीं जानते की मैं पहाड़ी समझता हूं। एक लम्‍बे समय तक आकाशवाणी शिमला से नैमितिक उदघोषक और प्रादेशिक समाचार वाचक के रूप में जुड़ा रहा। किन्‍नौरी और लाहोल स्पिति को छोड़ कर अन्‍य बोलियों को प्राय: समझ जाता हूं परन्‍तु बोल नहीं पाता।
छुटी मिलते ही जैसे ही वे अपनी बोली में टिप्‍पणी करते मैं भी टूटी फूटी पहाड़ी में कुछ न कुछ जरूर कर देता । धीरे धीरे टिप्‍पणीयां तो बन्‍द हो गई लेकिन छुटी लेने का सिलसिला जारी ही रहता है। अवकाश अनुमादित करते ही मैं कह देता हूं ढेयो वे ढेयाे ( जाओ अब) ।



कुमारसैन शहर में जीवन का काफी समय गुजारा है । अनेक मित्र बने । गप्‍प शप्‍प जीवन अनुभव की बातें जीवन चर्या का एक हिस्‍सा है। मित्रों की गप्‍पें हमेशा ठाहके भरी होती है। एक मित्र है वैसे उमर में मेरे से काफी बड़े है के साथ चाए का दौर चलता ही है। चाए की अधिकता को देखते हुए मैं हमेशा एक कप मंगवाने का आग्रह करता हूं और कहता हूं एक बटा दो कर लेते है लेकिन चाए हमेशा ही पूरी ही आई। उन्‍होने दुकान परिवर्तन की तो मिलना कम हो गया। जबभी उनकी दुकान के सामने से गुजरता हूं तो वे कह उठते है वो एक बटा दो बहुत सी इक्‍कठी हो गई है जनाब। मेरे बैठते ही वे जोर से आवाज़ देकर चाए मंगवा लेते है दस पंद्रह मिनट चाए के साथ गप्‍प शप्‍प और ठहाके लगते है और मैं निकल आता हूं वादा करके एक और एक बटा दो के दौर का।
एक बार उन्‍होने ने शराबी कितने प्रकार के होते है और उनकी क्‍या पहचान होती है कि विस्‍तृत जानकारी दी जिस पर हम हंस हंस कर लोट पोट हुए। ओ हो क्षमा चाहूंगा आपको उन मित्र का नाम तो बताया ही नहीं । उनका .......

लेखा जोखा



आपके पधारने के लियें धन्यवाद Free Hit Counters

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